Wednesday, October 30, 2013

Sikhla Do....

जीना तो मुझे आता ही नहीं, मरने के तरीके बतला दो
ख़ुश रहना कभी सीखा ही नहीं, आँसू पीना ही सिखला दो

माहौले ज़श्न तो हुए नहीं, मातम पुरसी ही सिखला दो
रंगीन फ़िज़ा कभी हुई नहीं, पतझड़ सहना ही सिखला दो

चुप रहकर तो  बरसों गुज़रे, मुझे ख़ुद को कहना सिखला दो
घुट घुट करके साँसे थकती, इन्हें अब तो थमना सिखला दो

कोई साथ चले तक़दीर नहीं, मुझे बेज़ा भटकन सिखला दो
मेरे ख्वाब में भी उम्मीद नहीं, मुझे ज़िंदा मरना सिखला दो

ज़न्नत मेरी किस्मत है ही नहीं, दोज़ख की तरफ़ ही भिजवा दो
मरके भी सुकून क्या मिले मुझे, मुझे अब सहना ही सिखला दो

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